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संगम

संगम

यह वह स्थान है जहां गंगा का मटमैला पानी यमुना के हरे पानी में मिलता है। यहीं मिलती है अदृश्य मानी जाने वाली सरस्वती नदी। वैसे तो यह अदृश्य नदी है पर माना जाता है कि यह भूगर्भ में बहती है । संगम सिविल लाइन्स से 7 किमी पर पड़ता है। इसे अकबर के किले के परकोटे से भी देखा जा सकता है।

पवित्र संगम पर दूर-दूर तक पानी और गीली मिट्टी के तट फैले हुए हैं। नदी के बीचों-बीच एक छोटे से प्लॅटफॉर्म पर खड़े होकर पुजारी विधि-विधान से पूजा-अर्चना कराते हैं। धर्मपरायण हिंदू के लिए संगम में एक डुबकी जीवन को पवित्र करने वाली मानी जाती है। संगम के लिए किराये पर नाव किले के पास से ली जा सकती है। कुंभ/महाकुंभ पर संगम मानो जीवंत हो उठता है। देश विदेश भर से श्रद्धालु यहां आते हैं और इसकी रौनक बढ़ाते हैं।

 
 

कुम्भ मेला

कुम्भ मेला में साधू-संत एवं तीर्थयात्री

प्रयागराज का बतौर तीर्थ हिन्दुओं में एक महत्वपूर्ण स्थान है। परंपरागत तौर पर नदियों का मिलन बेहद पवित्र माना जाता है, लेकिन संगम का मिलन बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। क्योंकि यहां गंगा, यमुना और सरस्वती का अद्भुत मिलन होता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान विष्णु अमृत से भरा कुम्भ (बर्तन) लेकर जा रहे थें कि असुरों से छीना-झपटी में अमृत की चार बूंदें गिर गई थीं। यह बूंदें प्रयाग, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन रुपी तीर्थस्थानों में गिरीं। तीर्थ वह स्थान होता है जहां कोई भक्त इस नश्वर संसार से मोक्ष को प्राप्त होता है। ऐसे में जहां-जहां अमृत की बूंदें गिरी वहां तीन-तीन साल के अंतराल पर बारी-बारी से कुम्भ मेले का आयोजन होता है। इन तीर्थों में भी संगम को तीर्थराज के नाम से जाना जाता है। संगम में हर बारह साल पर कुंभ का आयोजन होता है।

कुम्भ मेला में गंगा आरती

भारत में महाकुम्भ धार्मिक स्तर पर बेहद पवित्र और महत्वपूर्ण आयोजन है। इसमें लाखों लोग शिरकत करते हैं। महीने भर चलने वाले इस आयोजन में तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए टेंट लगा कर एक छोटी सी नगरी अलग से बसाई जाती है। यहां सुख-सुविधा की सारी चीजें जुटाई जाती हैं। यह आयोजन प्रशासन, स्थानीय प्राधिकरणों और पुलिस की मदद से आयोजित किया जाता है। इस मेले में दूर-दूर के जंगलों, पहाड़ों और कंदराओं से साधु-संत आते हैं। कुम्भयोग की गणना कर स्नान का शुभ मुहूर्त निकाला जाता है। स्नान के पहले मुहूर्त में नागा साधु स्नान करते हैं। इन साधुओं के शरीर पर भभूत लिपटी रहती है, बाल लंबे होते हैं और यह मृगचर्म पहनते हैं। स्नान के लिए विभिन्न नागा साधुओं के अखाड़े बेहद भव्य तरीके से जुलूस की शक्ल में संगम तट पर पहुंचते हैं। पिछला महाकुम्भ 2013 में पड़ा था तो अगला कुम्भ 2025 में पड़ेगा।

 
 

इलाहाबाद का किला

पुराना किला

इस मजबूत किले का निर्माण बादशाह अकबर ने 1583 में कराया था। यह संगम स्थल पर यमुना नदी के किनारे स्थित है। अपने समय में इसकी गिनती वास्तुकला, निर्माण और कारीगिरी के मामले में सर्वश्रेष्ठ किले के तौर पर होती है। इस शानदार किले में तीन विशालकाय गलियारे हैं, जिनमे तीन आकर्षक और ऊँचे टावर हैं। फिलहाल इसका इस्तेमाल भारतीय सेना कर रही है और इसका एक सीमित हिस्सा ही पर्यटकों के लिए खुला है। पानी को रोके खड़ी किले की बाहरी दीवार आज भी बहुत मजबूत है। यहां पर्यटकों को अशोक स्तंभ और सरस्वती कूप को ही देखने की अनुमति है। पॉलिश किए हुए बलुई पत्थर से बना यह विशालकाय अशोक स्तंभ 10.6 मीटर ऊंचा है। इसका इतिहास 232 ई.पू. तक जाता है। इस स्तंभ पर बादशाह जहांगीर के कई फरमान और पर्शियन भाषा में महत्वपूर्ण बातें अंकित हैं। खासकर उनके द्वारा गद्दी संभालने का ज़िक्र इस पर अंकित है।
इसके अलावा यहाँ पातालपुरी मंदिर भी बेहद पवित्र माना गया है। अक्षय वट या अमर बरगद का पेड़ भी भक्तजनों के लिए आकर्षण का केंद्र है। किले के भीतर इस भूमिगत मंदिर में स्थित है अक्षय वट। कहते हैं यहां भगवान श्रीराम भी आए थें। इसके अलावा चीनी यात्री ह्यून सांग ने भी अपनी यात्रा के दौरान महल के इस मंदिर के दर्शन किए थें और अपने संस्मरणों में इसके बारे में लिखा था।

 

मिंटो पार्क

मिंटो पार्क

यह सरस्वती घाट के पास स्थित है। इसमें एक पत्थर का स्मारक है इसके शीर्ष पर चार शेरो का प्रतीक लगा हुआ है । मिंटो पार्क की नींव लॉर्ड मिंटो ने 1910 में रखी थी । 1858 में आजादी के प्रथम संग्राम 1857 के पश्चात ईस्ट इंडिया कंपनी ने मिंटो पार्क में आधिकारिक तौर पर भारत को ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया था। इसके बाद शहर का नाम इलाहाबाद रखा गया तथा इसे आगरा-अवध संयुक्त प्रांत की राजधानी बना दिया गया।

 

श्रृंगवेरपुर

श्रृंगवेरपुर प्रयागराज के पास स्थित भ्रमण स्थलों में से एक महत्वपूर्ण स्थल है। यह एक पर्यटक स्थल है जो लखनऊ रोड पर प्रयागराज से 45 कि.मी कि दूरी पर स्थित है। स्थानीय लोककथाओं के आधार पर यही वह जगह है जहाँ भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास पर जाते हुए रास्ते में गंगा नदी को पार किया था। हालांकि श्रृंगवेरपुर का वर्णन महाकाव्य रामायण में हुआ है फिर भी यह धीरे-धीरे प्रमुखता प्राप्त कर रहा है। रामायण में इस स्थान का वर्णन निशादराज “मछुआरों का राजा” के साम्राज्य की राजधानी के रूप मे किया गया है। श्रृंगवेरपुर में उत्खनन कार्यों के दौरान यहाँ एक श्रृंगी ऋषि का मंदिर सामने आया है। ऐसा माना जाता है कि शहर को यह नाम उस ऋषि से ही प्राप्त हुआ है। रामायण में यह उल्लिखित है कि श्रृंगवेरपुर में भगवान राम ने भाई लक्ष्मण व पत्नी सीता सहित इस ग्राम में वनवास जाने से पूर्व एक रात्री बिताई थी क्योंकि मांझी ने उन्हे नदी पार करने से इंकार कर दिया था जिसके उपरांत स्वयं निशादराज उस स्थान पर उस समस्या का हल निकालने आया था। ऐसा कहा जाता है कि निशादराज ने यह शर्त रखी कि भगवान राम को तभी नदी पार करवाएंगे जब वह निशादराज को अपने चरणों को धोने की अनुमति देंगे। माना जाता है कि भगवान राम ने उसे अनुमति दे दी तथा उसने भगवान राम के चरण गंगा नदी के पानी से धोए और उसी को पीकर भगवान राम के प्रति अपनी श्रद्धा को दर्शाया। जिस स्थान पर निशादराज ने भगवान राम के पैरों को धोया था, वह एक मंच द्वारा चिह्नित किया गया है। इस घटना से जोड़ने के लिए इस स्थान का नाम ‘रामचुरा’ रखा गया है। इस स्थल पर एक छोटा मंदिर भी मौजूद है। हालांकि इस मंदिर का कोई ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व नहीं है, परंतु यह जगह बहुत ही शांत है तथा भ्रमण करने योग्य है।.

 

ऑल सैंट केथेड्रल (पत्थर गिरजाघर)

ऑल सैंट केथेड्रल

ऑल सैंट केथेड्रल सर विलियम एमर्सन की बेहतरीन डिजाइन का एक और नमूना है। 1871 में इसका निर्माण शुरू हुआ जो 1887 में जाकर पूरा हुआ। पूरे एशिया में यह अपने किस्म का अनूठा एंग्लिकन केथेड्रल है। यहां आने वाला कोई भी शख्स इसके सम्मोहन से बच नहीं सकता।

 

खुसरो बाग़

खुसरो बाग़

एक दीवार वाला बगीचा जिसमें 17 वीं शताब्दी में निर्मित चार महत्वपूर्ण मुगल कब्रिस्तान शामिल हैं। इस पन्ना उद्यान परिसर में एक समृद्ध इतिहास है। कब्रों में से एक राजकुमार खुसरो से संबंधित है जो जहांगीर का सबसे बड़ा पुत्र था। एक और खुसरो की मां शाह बेगम से संबंधित है। खुसरो की बहन नेसा बेगम द्वारा तीसरी मकबरा का निर्माण किया गया था, जो उस पर कई कलात्मक नक्काशी के साथ सुंदर है लेकिन खाली रहता है। आखिरी जो छोटा है उसे तामारलन की मकबरे के रूप में जाना जाता है और यह एक रहस्य बना रहता है। जगह की कलात्मक सुंदरता आगंतुकों को आश्चर्यचकित कर देती है। खूबसूरत मेहराब, गुंबद और छत्री समय व्यतीत करने और प्रशंसा के लायक हैं। यह प्रयागराज के लुकगंज में स्थित है, जो प्रयागराज जंक्शन स्टेशन के नजदीक शहर के मुख्य क्षेत्रों में से एक है।

 

इलाहाबाद संग्रहालय

चंद्रशेखर आजाद पार्क (कंपनी बाग) में स्थित इलाहाबाद संग्रहालय भारत के राष्ट्रीय स्तर के संग्रहालयों में से एक है। ऐतिहासिक कलाकृतियों, चित्रों, मूर्तियों और तस्वीरों का एक अच्छी तरह से रखा भंडार संग्रहालय की दीर्घाओं में देखा जा सकता है। यहाँ स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद की एक बेहद आकर्षक मूर्ति भी देखी जा सकती है जो एक लाल इमारत के बाहर अपने मूंछों को घुमाती हुई मुद्रा में है। यह संग्रहालय इलाहाबाद रेलवे जंक्शन से लगभग 3 किलोमीटर दूर है और प्रयाग और रामबाग रेलवे स्टेशनों से लगभग बराबर है और बमराउली हवाई अड्डे से लगभग 12 किमी दूर है। खूबसूरत स्थान, बड़े फैले हुए हरे रंग के लॉन और अच्छी तरह से रखे बगीचे ने इसे एक विशेष आकर्षण दिया है। यह मूल रूप से 1931 में प्रयागराज नगर पालिका के तहत पक्षियों और जानवरों के मॉडल के एक छोटे संग्रह के साथ स्थापित किया गया था। उसी परिसर में गांधी स्मृति वाहन भी है जिसका प्रयोग गांधी जी की अस्थियों को संगम तक ले जाने के लिए किया गया था।

 

उल्टा किला

उल्टा किला प्रयागराज जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर झूंसी क्षेत्र में है। इस किले का नाम उल्टा किला, झूंसी के शासक राजा हरिबोंग के बारे में एक कहानी से पड़ा। यह कहा जाता था की राजा हरिबोंग अवगुणों से भरा हुआ था और उसके निर्णय हमेशा उसके राज्य के लोगों को नुकसान पहुंचाते थे। एक दिन उसने एक संत को खाने के लिए कुछ गलत दिया, संत ने उसे शाप दिया कि एक सितारा अपने किले पर गिर जाएगा, जो इसे उल्टा कर देगा। इस प्रकार, संत अली मुर्तजा के आदेशों से, मिर्रीख तारा इस किले पर गिर गया और तब से किला उल्टा है।

 

इस्कॉन मंदिर

प्रयागराज का इस्कॉन मंदिर यमुना नदी के किनारे स्थित है। मंदिर में एक छोटा सा परिसर है जिसमे भक्तों के लिए गोशाला के साथ धर्मशाला है। पिछले वर्षों में भक्तों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। श्री राधा वेणी माधव देवताओं को वर्ष 2003 में स्थापित किया गया था। मंदिर अपने नीरव वातावरण के साथ एक शांतिपूर्ण स्थल है। यह सुंदर मंदिर हर किसी के लिए खुला है। भक्त यहां भी ध्यान कर सकते हैं।

 

श्री अखिलेश्वर महादेव

श्री अखिलेश्वर महादेव

श्री अखिलेश्वर महादेव परिसर चिनामाया मिशन के तहत रसूलबाद घाट रोड के पास प्रयागराज में लगभग 500 वर्ग फुट के क्षेत्र में फैला हुआ है। नींव के पत्थरों को 30 अक्टूबर, 2004 को परम पूज्य स्वामी तेजोमायनंदजी और चिन्मय मिशन के पूज्य स्वामी सुबोधनंदजी ने रखा था। राजस्थान के गुलाबी सैंडस्टोन को तराश कर आधार भूमि के ऊपर श्री अखिलेश्वर महादेव ध्यान मंडपम को आकार दिया गया है।
राजस्थान से गुलाबी रेत के पत्थरों को फाउंडेशन फर्श पर श्री अखिलेश्वर महादेव ध्यान मंडपम को आकार देने के लिए नक्काशीदार और तय किया जा रहा है। भूतल की रचना इस हिसाब से की गयी जिसमे लगभग 300 व्यक्तियों की क्षमता वाले सत्संग भवन और श्री अखिलेश्वर महादेव के लिए सभी आवश्यक सेवाएं को समायोजित किया जा सके।

 

 

प्रयाग के मंदिर

ऋग वेद के समय से ही प्रयाग को सबसे पवित्र तीर्थस्थान माना जाता है ।इसका मुख्य कारण यहाँ पर गंगा यमुना के संगम का होना है ।ऐसा माना जाता है कि संगम के किनारे मृत्यु होने से मानव जन्म मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष को प्राप्त करता है ।महाभारत, अग्निपुराण,पदमपुराण और सूर्यपराण में भी प्रयाग को पवित्र तीर्थस्थान माना गया है ।विनय पत्रिका में ऐसा उल्लेख किया गया है कि गौतम बुद्ध ने पराया की यात्रा ४५० ईसा पूर्व में की थी ।

प्रयाग माधो मंदिरों के लिए भी प्रसिद्ध है। 12 माधो मंदिर विभिन्न स्थानों पर स्थित हैं नीचे दिए गए हैं: –

  • साहेब माधो: त्रिवेणी के पूर्व में यह चातानागा बगीचे में स्थित है जो व्यासजी के स्थान पर है। शिवपुराण यहीं लिखा गया था ।
  • अद्वेनी माधो :यह दारागंज में रामचरणअग्रवाल की कोठी के पास स्थित है। लक्ष्मीनारायण जी की मूर्ति यहाँ है ।
  • मनोहर माधो :- दर्वेश्वरनाथ के मंदिर में, भगवान विष्णु की एक मूर्ति है जिन्हें मनोहर माधो कहा जाता है।
  • चारा माधो :-अग्निकोर-अरैल में स्थित है।
  • गदा माधो :- गदामाधो: छेओकी रेलवे स्टेशन के पास स्थित है।
  • आदम माधो :- देवरिया गांव में स्थित है।
  • अनंत माधो :-खुल्दाबाद से लगभग दो मील दूर।
  • बिंदु माधो :- द्रौपदी घाट के आसपास के क्षेत्र में स्थित है।
  • अशी माधो :- नाग्बसुकी के पड़ोस में स्थित है।
  • संकटहरण माधो :- संध्या वट के नीचे स्थित है।
  • विष्णुयाअध् माधो :- अरैल में स्थित है।
  • वट माधो :- अक्षयवट के निकट स्थित है।

भारद्वाज आश्रम

भारद्वाज आश्रम

भारद्वाज आश्रम कोलोनगंज इलाके में स्थित है ।यहाँ ऋषि भारद्वाज ने भार्द्वाजेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थापित किया था, और इसके अलावा यहाँ सैकड़ों मूर्तियांहैं उनमें से महत्वपूर्ण हैं: राम लक्ष्मण, महिषासुर मर्दिनी , सूर्य, शेषनाग, नर वराह । महर्षि भारद्वाज आयुर्वेद के पहले संरक्षक थे । भगवान राम ऋषि भारद्वाज के आश्रम में उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आये थे । आश्रम कहाँ था यह अनुसंधान का एक मामला है, लेकिन वर्तमान में यह आनंद भवन के पास है ।यहाँ भी भारद्वाज, याज्ञवल्क्य और अन्य संतों, देवी – देवताओं की प्रतिमा और शिव मंदिर है । भारद्वाज वाल्मीकि के एक शिष्य थे ।यहाँ पहले एक विशाल मंदिर भी था और पहाड़ के ऊपर एक भरतकुंड था ।

 

नाग वासुकी मंदिर

नाग वासुकी मंदिर

यह मंदिर संगम के उत्तर में गंगा तट पर दारागंज के उत्तरी कोने में स्थित है । यहाँ नाग राज, गणेश, पार्वती और भीष्म पितामाह की एक मूर्ति हैं ।परिसर में एक शिव मंदिर है।नाग- पंचमी के दिन एक बड़ा मेला आयोजित किया जाता है।

 

मनकामेश्वर मंदिर

मनकामेश्वर मंदिर

यह मिंटो पार्क के पास यमुना नदी के किनारे किले के पश्चिम में स्थित है । यहाँ एक काले पत्थर की शिवलिंग और गणेश और नंदी की प्रतिमाएं हैं । हनुमान की भव्य प्रतिमा और मंदिर के पास एक प्राचीन पीपल का पेड़ है । यह प्राचीन शिव मंदिर प्रयागराज के बर्रा तहसील से 40 किमी दक्षिण पश्चिम में स्थित है । शिवलिंग सुरम्य वातावरण के बीच एक ८० फुट ऊंची पहाड़ी की चोटी पर स्थापित है । कहा जाता है कि शिवलिंग ३.५ फुट भूमिगत है और यह भगवान राम द्वारा स्थापित किया गया था । यहाँ कई विशाल बरगद के पेड़ और मूर्तियाँ हैं ।

 

पड़ला महादेव

पड़ला महादेव

यह फाफामऊ सोरों तहसील के उत्तर पूर्व में स्थित है ।यह पूरी तरह से पत्थर से निर्मित है और यहाँ कई मूर्तियाँ हैं । यहाँ शिवरात्रि और फाल्गुन के महीने में एक बड़ा मेला आयोजित किया जाता है ।

 

ललिता देवी मंदिर

ललिता देवी मंदिर

यह मीरपुर इलाके में स्थित है और १०८ फुट ऊँचा है । मंदिर परिसर में एक प्राचीन पीपल का पेड़ और कई मूर्तियां हैं ।इसे सिद्ध ५१ शक्तिपीठ के बीच में गिना जाता है ।

 

लाक्ष्य गृह

लाक्ष्य गृह

यह कहा जाता है कि कौरव राजा दुर्योधन ने पांडवों को जाल में फसाने और उन्हें समाप्त करने के लिए इसे बनाया था हालांकि, विदुर, जो कि एक गुप्त द्वार से भाग निकले थे उन्होंने पांडवों को सतर्क कर दिया था। यह गंगा नदी के तट पर हंडिया के ६ किमी दक्षिण में स्थित है ।

 

अलोपी देवी मंदिर

अलोपी देवी मंदिर

यह प्राचीन मंदिर अलोपीबाग दारागंज इलाके के पश्चिम में स्थित है ।मंदिर के गर्भगृह में एक मंच है वहाँ एक रंग का कपड़ा है ।भक्त यहाँ श्रद्धा का भुगतान करते हैं । यह शक्तिपीठों में से एक कहाँ जाता है और एक बड़े मेले का आयोजन नवरात्रि के दौरान किया जाता है । वहाँ भगवान शिव और शिवलिंग की एक मूर्ति है ।

 

तक्षकेश्वर नाथ

तक्षकेश्वर नाथ

तक्षकेश्वर प्रयागराज शहर के दक्षिण में यमुना के तट पर दरियाबाद इलाके में स्थित भगवान शंकर का मंदिर है । यमुना नदी से थोड़ी दूर तक्षक कुंड है । ऐसी कथा प्रचलित है कि तक्षक नागिन भगवान कृष्ण द्वारा पीछा करने पर यहाँ आश्रय लिया था। यहाँ कई लिंग और बहुत सी मूर्तियाँ हैं । इसके अलावा हनुमान जी की भी मूर्ति है ।

 

समुद्र कूप

समुद्र कूप

यह गंगा नदी के तट पर ऊँचे टीले पर स्थित है। इसका व्यास 15 फुट है । यह बड़े पत्थर से बनाया गया है। कहा जाता है कि यह राजा समुद्रगुप्त द्वारा बनाया गया था इसलिए इसका नाम समुद्र कूप है । ऐसा भी मानना है कि इसका जल स्तर नीचे समुद्र स्तर के बराबर है ।

 

सोमेश्वर मंदिर

सोमेश्वर मंदिर

यह यमुना नदी के तट पर किले के अंदर जमीनी स्तर के नीचे बना हुआ है ।यहाँ लंबे गलियारे है और केंद्र में एक शिवलिंग के साथ ४४ मूर्तियाँ हैं । यह १७३५ में बाजीराव पेशवा द्वारा पुनर्निर्मित किया गया और कुछ मूर्तियों को १७वीं या 18वीं सदी में निर्मित किया गया था ।कहा जाता है कि भगवान राम अपने निर्वासन के दौरान यहाँ आए थे ।

 

शीतला मंदिर

शीतला मंदिर

यह प्रयागराज के ६९ किमी उत्तर पश्चिम में स्थित है ।महान ऋषि संत मलूकदास कदा में १६३१ में पैदा हुआ थे, यहीं उनकी समाधि और आश्रम स्थित हैं ।यहाँ देवी शीतला का एक मंदिर और एक तालाब है ।यहाँ एक किले के खंडहर भी हैं ।

 

कल्याणी देवी

कल्याणी देवी

यहाँ यमुना की देवी कल्याणी देवी का एक मंदिर है ।यहाँ २० वीं सदी में निर्मित देवी और भगवान शंकर की मूर्तियाँ हैं ।

 

प्रभास गिरि

यह प्रयागराज शहर के ५० किमी उत्तर में कौशाम्बी जिले के मंझनपुर तहसील में स्थित है ।कौशाम्बी से १० किमी दूर यह क्षेत्र, वत्स साम्राज्य की राजधानी थी । ऐसी मान्यता है कि भगवान कृष्ण ने तीर लगने के बाद इस सांसारिक दुनिया को यहीं पर छोड़ा था । यहाँ एक बड़ा जैन मंदिर है । यह जैन समुदाय के लिए तीर्थ है । यह क्षेत्र भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण क्षेत्र के रूप में संरक्षित है ।

 

शिवकुटी

शिवकुटी

गंगा के तट पर प्रयागराज शहर के उत्तरी छोर पर शिवकुटी मंदिर और आश्रम है । १९४८ में स्थापित श्री नारायण प्रभु का आश्रम भी यही है ।लक्ष्मी नारायण मंदिर में संगमरमर की मूर्तियाँ हैं । यहाँ एक दुर्गा मंदिर भी है । यहाँ श्रावण के महीने में एक बड़े मेले का आयोजन होता है ।

 

कमौरी नाथ महादेव

यह सूरजकुंड इलाके के पास रेलवे कॉलोनी में स्थित है। १८५९ में इस मंदिर की वजह से रेलवे लाइन को विस्थापित करना पड़ा था ।यहाँ पंचमुखी महादेव की एक मूर्ति है ।

 

हाटकेश्वर नाथ मंदिर

हाटकेश्वर नाथ मंदिर

यह प्रयागराज शहर में शून्य सड़क पर स्थित है । यहाँ भगवान हाटकेश्वर सहित भगवान शिव की कई मूर्तियाँ हैं ।

 

कृष्णा परनामी भजन मंदिर

बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल ने परनामी संप्रदाय की शुरुआत की थी । यह मंदिर १७०० में बनाया गया था । यहाँ जन्माष्टमी पर एक विशाल मेला आयोजित किया जाता है ।

 

सुजावन देव

यह यमुना नदी के तट पर घूरपुर से ३ किमी पश्चिम में स्थित है । यहाँ शंकर और यमुना का एक मंदिर है ।

 

बरगद घाट शिव मंदिर

यह मंदिर मीरपुर के पास यमुना नदी के तट पर बरगद घाट पर स्थित है । यहाँ एक काले पत्थर का शिवलिंग और एक प्राचीन बरगद पेड़ (बरगद) है । पीपल के चार पेड़ और हनुमान जी की एक मूर्ति भी यहाँ है ।

 

सिद्धेश्वरी पीठ

यह प्रयागराज शहर के बस स्टेशन के सामने सिविल लाइंस में स्थित है ।इस मंदिर में शंकर, अष्टभुजा देवी और हनुमान की मूर्तियाँ है ।

 

शंकर विमान मंडपम

शंकर विमान मंडपम

यह भव्य मंदिर कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती की पहल पर बनाया गया और १९८६ में शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती द्वारा इसका उदघाटन किया गया था ।यह द्रविड़ वास्तुकला शैली में निर्मित है। तीन मंजिला यह संरचना के १६ विशाल स्तंभों पर निर्मित है ।यह संगम के तट पर है । इसकी ऊंचाई १३० फीट है । इसका निर्माण १६ साल में पूरा किया गया था । यहाँ कामाक्षी, भगवान बालाजी और भगवान शिव की मूर्तियाँ हैं ।

 

शंकर मंदिर महावन

इस ऐतिहासिक मंदिर कोरों कौरहार सड़क पर मेजा तहसील में कोरों से ८ किमी उत्तर पश्चिम में स्थित है ।भगवान शंकर का यह मंदिर एक तालाब के पास स्थित है ।यहाँ एक काले पत्थर की मूर्ति और एक प्राचीन पीपल वृक्ष है ।

 

वेणी माधव मंदिर

वेणी माधव मंदिर

यह दारागंज इलाके में स्थित है । यहाँ राधा और भगवान कृष्ण की आकर्षक मूर्तियाँ हैं ।प्रयाग में १२ माधव देवताओं का उल्लेख मिलता है लेकिन दारागंज में संगम के करीब वेणी माधव मंदिर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है ।

 

दुर्वासा आश्रम

दुर्वासा आश्रम

प्रयाग के पूर्व की ओर गंगा के तट पर ककरा कोतवा और हनुमान बाजार के ५ किमी दक्षिण में यह प्राचीन आश्रम स्थित है ।यहाँ ऋषि दुर्वासा की एक भव्य मूर्ति है । यहाँ सावन के महीने में मेला आयोजित किया जाता है ।

 

शंकर मंदिर

यह ११वीं सदी के कलचुरी साम्राज्य के दौरान बनवाया गया था । यह लाप्री नदी के पास स्थित है । यह एक जीर्णशीर्ण अवस्था में है ।यहाँ की मूर्ति को लखनऊ में राज्य संग्रहालय में रखा गया है ।

 

अमिलिया शीतला देवी

यह शक्तिपीठ प्रयागराज से ५० किमी दूर बर्रा तहसील के तरहर क्षेत्र में स्थित है । वहाँ मसुरियां देवी की एक मूर्ति है । अगहन के महीने में यहाँ मेला आयोजित किया जाता है ।

 

गढ़वा

गढ़वा

यह प्रयागराज से ५० किमी दूर दक्षिण -पश्चिम की ओर जबलपुर सड़क पर स्थित है ।यहाँ एक प्राचीन किला और कई चन्द्रगुप्त युग मूर्तियाँ हैं ।

 

राधा माधव मंदिर

यह पुराने जी.टी. रोड पर मधवापुर में निम्बार्क आश्रम में स्थित है ।यहाँ राधा, कृष्ण, राम, लक्ष्मण और सीता की २०० साल पुरानी मूर्तियाँ हैं ।पत्थर की संरचना उत्तम है । और १९९२ में हनुमान जी की एक विशाल मूर्ति यहां स्थापित की गयी थी ।

 

बाड़ी काली

बाड़ी काली

यह देवी काली मंदिर मुट्ठीगंज इलाके में स्थित है । यहाँ सत्यनारायण, गणेश, हनुमान, शिव और शनिदेव की मूर्तियाँ हैं । यहाँ एक बलि कक्ष भी है ।

 

लोकनाथ मंदिर

यह पुराने लोकनाथ इलाके में स्थित है ।यहाँ एक शिवलिंग और कई देवी देवताओं की मूर्तियाँ है ।

 

कुनौरा महादेव

यह हंडिया बाजार के १२ किमी उत्तर में स्थित है ।यहाँ एक तालाब है इसी के पास एक हनुमान मंदिर और प्राचीन बरगद के पेड़ के पास एक प्राचीन शंकर मंदिर है ।

 

पत्थर शिवालय मंदिर

यह खुल्दाबाद सब्जी मंडी में पुराने जीटी रोड पर स्थित है ।यहाँ के मंदिर में काले पत्थर का शिवलिंग है।

 

बोलन शंकर मंदिर

यह मंदिर एक मेजा तहसील में विंध्य पहाड़ के पास स्थित तालाब के पास है । तालाब में पानी पहाड़ से आता है और यह तालाब कमल के फूलों से भरा है । तालाब के पास के कूप को बाणगंगा के रूप में जाना जाता है । माना जाता है कि अर्जुन ने दानव रानी हिडिम्बा की शुद्धि के लिए पहाड़ को फाड़ कर पानी निकाल दिया था ।यहाँ बहुत से जहरीले सांप पाए जाते हैं ।